Wednesday, August 23, 2017

कल फिर सुबह होगी

मेरी बस्ती के लोग
जियें तो कहें कि दर्द किधर है ।
रुक-रुक के सांसों का आना-जाना
और उधार की कोरी जिंदगी
सब समेटे हैं अपनी चादर में ।
बस दिखाने को दो पैनी दांतें
अधरों के बीच समेट कर
बमुश्किल रात और दिन
दिन और रात की पहरें गिनते हैं ।
कहो कि कल फिर सुबह होगी
और दिन निकलेगा ।
अंधेरों के प्रलय जाल का
काल कबलित होना
अवश्यम्भावी है ।
........रचना मनोज कुमार मिश्रा

Wednesday, July 13, 2016

हम हकीकत जानते हैं.......

थक गये रिश्ते चलकर बहुत? उन्हें आराम दे दो
वासन अधिक घिसने से मुलम्मा छूट जाता है।

ख्वाहिशें जलती रहीं सुनसान दर पर इस तरह
न हम किसी के हो सके न कोई हमारा हुआ।

लड़ लिया खुद से बहुत अब और ना हो फासला
जीत कर ही खो दिया सब, हारने का क्या गिला।

साफगोई कभी ऐसी है कि हँस के भी रो देते हैं
किस्मत का खेल है कि पा कर सब खो देते हैं।

कभी बिखर के उग जाऊँ तो ना कहना स्वार्थी
जग के संभाला हैं आँखों में बीज एक मेहराव की।

हम हकीकत जानते हैं वृक्ष के फैलाव का
हौसले में लिपटी है बहती गति सैलाब की।

बारिश से वार्ता

बारिश !
तुम्हारी बरसती बूंदों ने
देखो ये क्या कर दिया !

चिड़ियों का घोसला
उनका पंख, उनकी चोंच
गीला कर दिया
उनके पेट पर
पत्थर रख दिया
कीट-पतंगों को
निःशक्त बना दिया ।
चीटियों को ऐसे बहा ले जा रहे हो
मानों ताल में निर्वाध तैरती है
कागज़ की छोटी नाव !

गलियों में, घरों में, मुहल्लों में,
देहरी पर तुम्हारा आतंक
चहुंओर विद्यमान है !

तुमने देखी है उन आँखों को
जो कई रातों से उनींदी हैं?
नहीं न ?
उनमें तुम्हारी बूंदें पथरा गयी हैं !
क्यों घूम फिर कर उसी गली में
पागल प्रेमी की तरह जमे हुए हो?
बरसना ही है तो वहाँ बरसो
जहाँ कोमल कलियाँ
सर पटक-पटक कर
तुम्हारा राह देख रही हैं ।
तुम्हारा इंतजार ये निराश पेड़
गुम हुए सगे के वियोग की नाईं
एकांत मौन में कर रहे हैं ।

बरसना ही है तो नदियों में,
झीलों में, खेतों में, सागर में,
मुद्दत से सूने पड़े मन में
बरसो न झूम कर ।

तुम्हारे इतराने ने
हमारे अजीज को सड़क पर
बेनूर बना दिया है ।

तुम तो हठी बाला हो
वही करोगे जो मन कहेगा।
तुमने किसी की सुनी है
जो मेरी सुनोगे?

अरे !
बूंदों की रफ़्तार थमने लगी।
बदली की ओट से
देखो सूरज झांकने लगा।
डूबी बस्ती में जिजीविषा का
कोलाहल तैरने लगा।
जीने की चाह ने
फूटे छप्पर पर
हलचल की नींव रख दी ।

हम आज को
कल के भरोसे नहीं छोड़ सकते।
जीने की मुमूर्ष अभिलाषा ही
मानव की पैनी शक्ति है
जहाँ निर्माण और विध्वंश
दोनों की अविरल गति
साथ-साथ अठखेलियां करती हैं ।

Thursday, June 09, 2016

अद्भुत है भारत तेरी विरासत!

आज भीख मांगने वाली एक नन्हीं बाला को इलाहाबाद के यमुना नदी में एक रूपये का सिक्का बड़ी श्रद्धा से डालते देखा।
बात ये नहीं कि उसने नदी में सिक्का डाला।
बात है, बड़ी जतन से जमा किया धन का मोह त्याग !
तिल-तिल मरना पड़ता है एक-एक सिक्के के लिए। 
अपना जमीर मारना पड़ता है दूसरों के आगे हाथ फैलाने में। 
और फिर भी माया का दान बिना प्रतिदान की इच्छा के? निःसंदेह स्पृश्य है!
हर क्षण हम जिसे जोडते जाने की तमन्ना में समग्र सांसारिक कुचक्रों का जाल बुनते जाते हैं, उसका त्याग !
हे ईश! तुमने इतनी शालीनता उसकी चुप्पी में क्यों भर दी है?
उसका जटिल मौन उद्वेलित करता है।
काश! हम स्वनाम धन्य जन उसकी विराट सहनशीलता को भावो से स्पशॆ कर पाते ?
अद्भुत है भारत तेरी विरासत!

शेष होती है तो जीवन की सांसें............

जीवन अतृप्त से शुरू होकर अतृप्त पर ही समाप्त हो जाने वाली वृक्ष गाथा है। कहाँ से शुरू होकर कहाँ खत्म होगी इसका भान तक नहीं हो पाता। 
अगर हुआ भी, तब तक काया जीणॆ हो चुकी होती है। जीवन वीथि पर मोह अपने अंक में इस तरह जकडे रखती है कि हम ये जान नहीं पाते हमारा ध्येय क्या है।
सांसें हमें जिस राह खिंचती जाती है, हम खिंचते जाते हैं ।
चाह कभी शेष नहीं होती। शेष होती है तो जीवन की सांसें............

Monday, June 06, 2016

आज स्थिर है शैव बनकर

तपती दोपहरी में
बादल के किसी कोने से
स्पर्श की स्पंदित बूँदे
अनायास ही
रोम रोम गीला करता है।
उच्छवास
तरंगित जीवन गाथा का
एकांत गीत से
झंकृत है।
तन का मोह
मन की माया
सब तुम्हारी
दहलीज पर
रखकर खाली हाथ
लौट आया।
इसे सम्मान से
समेटकर कहीं
बंद कोठरी मे
कल के लिए
सहेज लेना
जीवंतता की
धरोहर होगी।
कौन जानता है?
आज का बीज
कल अंकुरित होकर
वृक्ष न बन जाय !
कौन जानता है?
सुवासित कन्दराओं में
पत्थरो का सीना चीरकर
किंचित कोई फूल
हँस न दे !
आँख की बूँदों का भार
नदी में बहती रेत है;
तल में चुपचाप
सरकती जाती है।
मौन तृष्णा भटक कर
संवाद में अर्थ की
परिभाषा तलाशने
लगती है।
हम कल की तस्वीरों में
रंग भर रहे हैं;
आज स्थिर हैं
शैव बनकर
शीतल शिलाओं पर
गहराती संवेदनाओं में
धर्म का मर्म
समेटे हुए।

Tuesday, May 31, 2016

आसां नहीं होता दामन बचाना

कहाँ सज्दे में सर झुके तुम्ही कह दो  तो अच्छा है
मेरी आंखे तो झुकती हैं हर नम आंखों को देखकर।

तेरे रूखसार की रोज बंदगी मेरे शय में अब भी शामिल है
जिस हाल में हों मुस्कराया तेरी नूर-ए-रहमत देखकर ।

बहुत ही मुश्किल है जनाजा उठाकर फिर सुला देना
आसां नहीं होता दामन बचाना मज़हबी हंसी देखकर ।

तेरे शहर में कैसे सो जाऊँ जमीर अपनी टांगकर
क्या गुजरेगी उन फकीरों पर हमको नशे में देखकर ।

बिखर के जीना औ' जी कर बिखरना आसां नहीं है मन्नू
तंज कसते हैं बेवजह लोग मुफलिसी रूखाई देखकर ।

समेट लाता हूँ अपने दामन में उधार की कुछ बची नज्में
कल हों न हों कह नहीं सकते हालात-ए-मंज़र देखकर ।

बहुत जी लिया यहाँ रफ़्तार-ए-नब्ज गिन-गिन कर
कि मर भी नहीं सकते खुदाया आहट तेरी देखकर ।

मिला है खाक में नफरत अदब से दरिया और दरख्तों का
साहिल को किनारे जाने दो लहरों का कलंदर देखकर ।

अधूरा सपना


सुबह की बारीश ने
घोल दिया अधूरा सपना ।
उनींदी आँखों में
चुप्पी उतरने लगी
सूरज के साथ-साथ ।
अधूरी कहानी गीली घास पर
रेंगती ईल्ली-सा
अपना मुकाम ढूँढती है।

अनजान चेहरे बिदककर
गहराती आद्रता में
अपना ठौर तलाशने
आहव्लादित पतंगों-सा फुदकते हैं
इधर-उधर जलती लौ के इर्द-गिर्द ।

सपना खो गया है ।
नींद अधूरी है ।
नीम का गीला गाल
आईने में नहीं समाता
शीशम तिरोहित है
वृक्षों की सभाओं में
आम गुमसुम है भीगकर
मासूम बादल के नीचे
अगली रात का इंतजार
चाँद के साथ बाकी है
कि सपना पूरा हो
घरौंदो में मढ़े रोशनदान-सा
कि हवा आती-जाती रहे
स्वछंद बच्चों की किलकारी जैसी ।

Monday, May 23, 2016

जीवन अगर क्षितिज होता

जीवन अगर क्षितिज होता
सार मिलन का तय करते
चन्द्र वलय-सा पुलकित हर्षित
चारू विनय कुसुम खिलते ।
मोहक प्रभा विहंगम तान
निशा हिमकर का प्रेम वितान
सरपट ढलता पहर पलक-सा
एक भूल नित-नित अज्ञान ।
तुम चित्र बना रंग भरती जाती
स्वप्नलोक की रचना जैसी
परम प्रासाद लोक में अविरल
धवल दिव्य प्रवंचना जैसी ।
हम धरा धाम के हैं वासी
कोई मधुर गीत ना गा पायें
आओ अनन्त में कल्पना का
एक नवल सुकोमल नीड़ बनायें ।
कौन जानता चंचल जीवन
किस बीहड़ में मोड़ेगा
कल की सांसें आज ही गिन लें
समय कहाँ कब छोड़ेगा ?
चंचल किरणें थिरक-थिरक
कुछ नाद मनोरम गा पायें
जिस राह चले हम दिवा-स्वप्न में
सुप्त मनोरथ जग जायें ।
हाँ! मन का हाला मतवाला
आज चाँद पेड़ से मिलने आया
कुछ वह विनोद में, मैं मुखरित
मिलकर चादर सिलने आया ।
हे मनुज! तुम्हारी रचना ने
कण-कण में मंगल गाया है
इह लोक व्यथा अब व्यर्थ न हो
घर मिलने कानन आया है।
चल, हमें भुलावा देकर ले चल
मौन रथों पर तम के पार
जहां मिलन की शाश्वत गाथा
गाता है सुंदर सुकुमार ।

Friday, May 06, 2016

चाँद! तुम तरल हो रहे हो

चाँद !
तुम रुई-सा मुलायम
और पानी-सा
तरल हो रहे हो
गीली मिट्टी जैसे
धीरे धीरे सरकना
सीख लिया है ।
उष्ण रातों में
मंद मीठी पछुआ वयार की नाईं
शीतल सिलवटी गालों पर
एक सुखद एहसास की
नजरें फेर देते हो ।
धुप का धुआं जैसे
दीपक की लौ से लिपटकर
अपना अस्तित्व बोध
खोने लगता है
मेरा मृदुल शुन्य
तुम्हारे विराट में
शनैः शनैः घुलने लगा है ।

तुमने  कोमलता, निर्भीकता 
पाताल की गहराई और
सागर का विस्तार कैसे पाया?
एक बात मुझे भी समझाओ (समझाओगे?)
फूलों की लालिमा-सी शर्म
जीवन की गहरी धुंध में भी
हँसते-हँसते वक़्त को 
कुरेदना,
अट्टहास करना,
बरसते बादल को एकटक
शांतचित्त कोने में छुपकर
निहारना
कहाँ से सीखा ?
शक्तिपुंज की तरह
चतुर्दिश सुख की
मखमली चादर फ़ैलाने का
गुण कहाँ से पाया ?

तुमको शायद समय ने 
स्त्रीत्व सीखा दिया 
और मैं ?
समय को पकड़ने की चाह में
कई हिस्सों में बंटता चला गया