Sunday, May 17, 2015

तुम कौन हो?

अतीत के बिखरे पन्नों पर
इतिहास का अर्थ ढूँढना
अगर इतना दुरूह न होता
तो हर मानव अपनी छवि की
एक सीधी परछाईं होता
जिसका रूप अनंत क्षितिज में
परिचित कल्पना की
एक सुंदर छायावृती होती.

आज हम अपने चेहरे की आकृति
औरों के आईनों में ढूँढने को बेबस है;
और सार्थक को भी निरर्थक मानकर
अपनी आत्मा  को दुत्कार देना
हमारी सहज प्रवृति
जो गूंगी होकर भी उँची आवाज़ में
कुछ इस तरह बोलती है
जैसे तलवार की धार से
लटकती हो लहू की दो बूँद

तब ऐसे में हमसे कोई ये पूछे
की तुम कौन हो?
और किसकी तस्वीर हो?
हमारे पास जवाब के लिए
अब क्या बचा है---
सिर्फ़ दो सजल नेत्र
जो बेजुवान किंतु सार्थक
शब्द बोलते है
जिसकी अपनी भाषा है
और अपनी सीमाएँ.

काश! उनकी भाषा का
संवेदनात्मक पहलू भी
कोई समझ पाता
और अर्थ को अर्थ के सापेक्ष में
मौन समझ जाने की
गहरी अनुभूति होती
तो हम भी
एक क़हक़हे के साथ कहते
कि मेरी पहचान को पहचानने वाला
इस विराट शून्य में कोई तो है
जो इन विसरित बूँदों की वेदनाओं को
आत्मसात कर लेना
अपनी नियति मानता है
और अपने स्व को तिरोहित करके
एक नया इतिहास बनाना
अपना आदर्श!