Wednesday, February 10, 2016

नियति की दुविधा

समय के सम्मान ने
तुझे मौन मूर्ति से
चंचल गुड़िया बना दिया
और हम उसकी शिलाओं को
खरोंच कर भी अपना नाम
नहीं लिख पाये !

नियति की दुविधा तो देखो
कि नदी के दो किनारे
आज बात करते हैं,
हँसते-खिलखिलाते हैं,
मौन साधना भी करते हैं,
फिर जानी-पहचानी राह चल देते हैं !

कल इसकी फेनिल प्रवाह ने
किनारे का गाँव तबाह किया था
खेतों में रेत भर दिया था
सोना उगलने वाली मिटटी को
दलदल बना दिया था
और जीवन की मुमूर्ष अभिलाषा को
चुपचाप डुबो दिया था !

आज हम जीवन ज्वार के 
उस किनारे पर खड़े हैं
जहाँ से प्रदीपन मीनार की
मस्तूल साफ दिखाई देती है
पर कल की तस्वीर नहीं !

हम बसते जा रहे हैं
कभी इस गली, कभी उस शहर
कभी इधर, कभी उधर
कभी यहाँ, कभी वहां 
दिशाहीन परिंदों की माफिक !

अब जाने दो इन बातों को !
ये समय है ! 
न हमारा, न तुम्हारा
न काल का, न मलाल का
न जीत का, न हार का
न कल का, न आज का 
चलना ही इसकी मर्यादा है !

चलो मंदिर के घंटे को आज
साथ-साथ बजा आएं 
सोये मूर्ति को फिर से जगा आएं 
मस्जिद के अजान पर
सज्दे में सर नवायें
कल हम कहाँ होंगे, तुम कहाँ !

बिखरे शब्दों की दस्तूर ही
हमारी पहचान है 
किसी रंगमहल की दीवारों पर
हँसती रंगीन चित्रकारी जैसी
जिसपर कोई बेनाम चित्रकार
कल कुछ रंग उकेर आया था !